न तू जमीं के लिए है, न आसमां के लिए
तेरा वजूद है अब सिर्फ दास्तां के लिए।
पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा
वो शाख ही ना रही, जो थी आशियां के लिए।
गरज परस्त जहां में वफ़ा तलाश न कर
यह शै बनी थी, किसी दूसरे जहां के लिए।
तेरा वजूद है अब सिर्फ दास्तां के लिए।
पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा
वो शाख ही ना रही, जो थी आशियां के लिए।
गरज परस्त जहां में वफ़ा तलाश न कर
यह शै बनी थी, किसी दूसरे जहां के लिए।