Sunday, July 15, 2018

दिल कहे रुक जा रे रुक जा, यहीं पे कहीं

दिल कहे रुक जा रे रुक जा, यहीं पे कहीं
जो बात (२) इस जगह में, है कहीं पे नहीं

पर्बत ऊपर खिड़की खूले, झाँके सुन्दर भोर,
चले पवन सुहानी
नदियों के ये राग रसीले, झरनों का ये शोर
बहे झर झर पानी
मद भरा, मद भरा समा, बन धुला-धुला
हर कली सुख पली यहाँ, रस घुला-घुला
तो दिल कहे रुक जा हे रुक जा...

नीली नीली झील में झलके नील गगन का रूप
बहे रंग के धारे
ऊंचे-ऊंचे पेड़ घनेरे, छनती जिनसे धूप
खड़ी बाँह पसारे
चम्पई चम्पई फ़िजा, दिन खिला-खिला
डाली-डाली चिड़ियों कि सदा, सुर मिला-मिला
तो दिल कहे रुक जा रे रुक...

परियों के ये जमघट, जिनके फूलों जैसे गाल
सब शोख हथेली
इनमें है वो अल्हड़ जिसकी हिरणी जैसी चाल
बडी छैल-छबीली
मनचली-मनचली अदा, छब जवां जवां
हर घड़ी चढ़ रहा नशा, सुध रही कहाँ
तो दिल कहे रुक जा रे रुक जा...|

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...