Friday, September 21, 2018

मन रे तू काहे न धीर धरे

मन रे तू काहे ना धीर धरे
ओ निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करे
मन रे तू काहे ना धीर धरे |

इस जीवन की चढ़ती ढलती
धूप को किसने बांधा
रंग पे किसने पहरे डाले
रुप को किसने बांधा
काहे ये जतन करे |

उतना ही उपकार समझ कोई
जितना साथ निभा दे
जनम मरन का मेल है सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई न संग मरे |

Thursday, September 20, 2018

बहार बनके वो मुस्कुराए हमारे गुलशन में
बाद-ए-सबा तू न आए तो क्या, काली घटा तू न छाए तो क्या
बहार बनके वो मुस्कुराए हमारे गुलशन में

मेरे दिल की राहों पे मेरे संग-संग आ
तुझको दिखला दूँ मैं हमदम अपना
रंगोंभरी दुनिया मेरी, मेरा प्यार पहला
बाद-ए-सबा तू न आए तो क्या, काली घटा तू न छाए तो क्या
बहार बनके वो मुस्कुराए हमारे गुलशन में

छुपके कोई आया है जबसे दिल में
हर दिन नई हलचल है मेरी महफ़िल में
धड़कन मेरी गाने लगी अभी गीत उनका
बाद-ए-सबा तू न आए तो क्या, काली घटा तू न छाए तो क्या

मतवाली डोलूँ मैं, खोई सपनों में
अब मेरा दिल लागे ना मेरे अपनों में
क्या मिल गया क्या खो गया, दिल ही जाने मेरा
बाद-ए-सबा तू न आए तो क्या, काली घटा तू न छाए तो क्या
बहार बनके वो मुस्कुराए हमारे गुलशन में

Film : Apne Huye Paraye
Music Director : Shankar-Jaikishan
Year : 1963 Singer(s) : Lata, Chorus
Audio Video On Screen Mala Sinha

Sunday, September 16, 2018

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है !
कि ज़िन्दगी तेरी जुल्फों की नरम छाओं में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी .
ये तीरगी जो मेरी जीस्त का मुक़द्दर है,
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी .

अजब न था कि मैं बेगाना ए अलम रहकर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज बदन तेरी नीमबाज आँखें
इन्ही हसीं फसानों में मैं खो रहता
पुकारती जब मुझे तल्खियाँ ज़माने की ..
तेरे लबों से हलावत के घूंट पे लेता ...
हयात चीखती फिरती बरहना सर..
और मैं घनेरी जुल्फों में चुप के जी लेता ...!!
मगर यह हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं, तेरा गम, तेरी जुस्तजू भी नहीं .
गुज़र रही हैं कुछ तरह जिंदगी जैसे इसे
किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं .

ज़माने भर के दुखो को लगा चुका हूँ गले
गुजर रहा हूँ कुछ अनजानी राहगुज़ारों से
मुहीद साए मेरी सिम्त बढते आते हैं
हयात ओ मौत के पुरहौल खाज़ारों से .
न कोई जादा, न मंजिल न रौशनी का सुराग
भटक रही हैं खल्वतों में यूँ जिंदगी अपनी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफस ....मगर यूँ ही

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ।

Thursday, September 6, 2018

ये किसका लहू है कौन मरा

धरती की सुलगती छाती के बैचेन शरारे पूछते हैं
तुम लोग जिन्हे अपना न सके, वो खून के धारे पूछते हैं

सड़कों की जुबान चिल्लाती है
सागर के किनारे पूछते हैं -
ये किसका लहू है कौन मरा
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

ये जलते हुए घर किसके हैं

ये कटते हुए तन किसके है,
तकसीम के अंधे तूफ़ान में
लुटते हुए गुलशन किसके हैं,
बदबख्त फिजायें किसकी हैं
बरबाद नशेमन किसके हैं,

कुछ हम भी सुने, हमको भी सुना.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा.

किस काम के हैं ये दीन धरम
जो शर्म के दामन चाक करें,
किस तरह के हैं ये देश भगत
जो बसते घरों को खाक करें,
ये रूहें कैसी रूहें हैं
जो धरती को नापाक करें,

आँखे तो उठा, नज़रें तो मिला.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बताये किसका लहू है कौन मरा.

जिस राम के नाम पे खून बहे
उस राम की इज्जत क्या होगी,
जिस दीन के हाथों लाज लूटे
उस दीन की कीमत क्या होगी,
इन्सान की इस जिल्लत से परे
शैतान की जिल्लत क्या होगी,

ये वेद हटा, कुरआन उठा.

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता
ये किसका लहू है कौन मरा।

Wednesday, August 22, 2018

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया – 4

उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया – 2
हे रामा!
उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया
आरे!
(बरफ़ी के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 2

अ हे अ हे… हे रामा

उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया – 2
आहा!
उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया
आरे!
(कपड़ा के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 3

जियो जियो पलकदस जियो!!

उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया – 2
हे रामा!
उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
आरे!
(बीड़ा के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 3

रात के रही थक मत जाना

रात के रही थक मत जाना
सुबह की मंजिल दूर नहीं
रात के राही ...

धरती के फैले आँगन में, पल दो पल है रात का डेरा
जुल्म का सीना चीर के देखो, झांक रहा है नया सवेरा
ढलता दिन मजबूर सही,
चढ़ाता सूरज मजबूर नहीं, मजबूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

सदियों तक चुप रहने वाले, अब अपना हक़ लेके रहेंगे
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ़ कहेंगे
जीते जी घुट घुट कर मरना
इस जग का दस्तूर नहीं, दस्तूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

टूटेंगी बोझल जंजीरे, जागेंगी सोयी तकदीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी, जंग लगी खूनी शमशीरें
रह नहीं सकता इस दुनिया में,
जो सब को मंजूर नहीं, मंजूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

Thursday, August 16, 2018

बाग़ में कली खिली बगिया महकी

बाग़ में कली खिली बगिया महकी पर हाय रे 
अभी इधर भँवरा नहीं आया
राह में नज़र बिची बहकी-बहकी और बेवजह
घड़ी घड़ी ये दिल घबराया हाय रे
क्यों न आया, क्यों न आया, क्यों न आया

बैठे हैं हम तो अरमाँ जगाये
सीने में लाखों तूफ़ाँ छुपाये 
मत पूछ मन को कैसे मनाया 
बाग़ में ... 

सपने जो आये तड़पाके जाये
दिल की लगी को दहकाके जाये
मुश्किल से हम ने हर दिन बिताया
बाग़ में ... 

इक मीठी अगनी में जलता है तन-मन 
बात और बिगड़ी आया जो सावन 
बचपन गँवाके मैं ने सब कुछ गँवाया 
बाग़ में ...


चित्रपट / Film: Chand Aur Suraj
संगीतकार / Music Director: Salil Choudhary
गीतकार / Lyricist: शैलेन्द्र-(Shailendra)
गायक / Singer(s): आशा भोसले-(Asha)

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...