Sunday, September 16, 2018

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है !
कि ज़िन्दगी तेरी जुल्फों की नरम छाओं में
गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी .
ये तीरगी जो मेरी जीस्त का मुक़द्दर है,
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी .

अजब न था कि मैं बेगाना ए अलम रहकर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज बदन तेरी नीमबाज आँखें
इन्ही हसीं फसानों में मैं खो रहता
पुकारती जब मुझे तल्खियाँ ज़माने की ..
तेरे लबों से हलावत के घूंट पे लेता ...
हयात चीखती फिरती बरहना सर..
और मैं घनेरी जुल्फों में चुप के जी लेता ...!!
मगर यह हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं, तेरा गम, तेरी जुस्तजू भी नहीं .
गुज़र रही हैं कुछ तरह जिंदगी जैसे इसे
किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं .

ज़माने भर के दुखो को लगा चुका हूँ गले
गुजर रहा हूँ कुछ अनजानी राहगुज़ारों से
मुहीद साए मेरी सिम्त बढते आते हैं
हयात ओ मौत के पुरहौल खाज़ारों से .
न कोई जादा, न मंजिल न रौशनी का सुराग
भटक रही हैं खल्वतों में यूँ जिंदगी अपनी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफस ....मगर यूँ ही

कभी -कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ।

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