Wednesday, August 22, 2018

रात के रही थक मत जाना

रात के रही थक मत जाना
सुबह की मंजिल दूर नहीं
रात के राही ...

धरती के फैले आँगन में, पल दो पल है रात का डेरा
जुल्म का सीना चीर के देखो, झांक रहा है नया सवेरा
ढलता दिन मजबूर सही,
चढ़ाता सूरज मजबूर नहीं, मजबूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

सदियों तक चुप रहने वाले, अब अपना हक़ लेके रहेंगे
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ़ कहेंगे
जीते जी घुट घुट कर मरना
इस जग का दस्तूर नहीं, दस्तूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

टूटेंगी बोझल जंजीरे, जागेंगी सोयी तकदीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी, जंग लगी खूनी शमशीरें
रह नहीं सकता इस दुनिया में,
जो सब को मंजूर नहीं, मंजूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...