Wednesday, August 22, 2018

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे

चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया – 4

उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया – 2
हे रामा!
उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया
आरे!
(बरफ़ी के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 2

अ हे अ हे… हे रामा

उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया – 2
आहा!
उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया
आरे!
(कपड़ा के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 3

जियो जियो पलकदस जियो!!

उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया – 2
हे रामा!
उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया
आरे!
(बीड़ा के सब रस ले लियो रे
पिंजड़े वाली मुनिया) – 3

रात के रही थक मत जाना

रात के रही थक मत जाना
सुबह की मंजिल दूर नहीं
रात के राही ...

धरती के फैले आँगन में, पल दो पल है रात का डेरा
जुल्म का सीना चीर के देखो, झांक रहा है नया सवेरा
ढलता दिन मजबूर सही,
चढ़ाता सूरज मजबूर नहीं, मजबूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

सदियों तक चुप रहने वाले, अब अपना हक़ लेके रहेंगे
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ़ कहेंगे
जीते जी घुट घुट कर मरना
इस जग का दस्तूर नहीं, दस्तूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

टूटेंगी बोझल जंजीरे, जागेंगी सोयी तकदीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी, जंग लगी खूनी शमशीरें
रह नहीं सकता इस दुनिया में,
जो सब को मंजूर नहीं, मंजूर नहीं
थक मत जाना, ओ राही थक मत जाना।

Thursday, August 16, 2018

बाग़ में कली खिली बगिया महकी

बाग़ में कली खिली बगिया महकी पर हाय रे 
अभी इधर भँवरा नहीं आया
राह में नज़र बिची बहकी-बहकी और बेवजह
घड़ी घड़ी ये दिल घबराया हाय रे
क्यों न आया, क्यों न आया, क्यों न आया

बैठे हैं हम तो अरमाँ जगाये
सीने में लाखों तूफ़ाँ छुपाये 
मत पूछ मन को कैसे मनाया 
बाग़ में ... 

सपने जो आये तड़पाके जाये
दिल की लगी को दहकाके जाये
मुश्किल से हम ने हर दिन बिताया
बाग़ में ... 

इक मीठी अगनी में जलता है तन-मन 
बात और बिगड़ी आया जो सावन 
बचपन गँवाके मैं ने सब कुछ गँवाया 
बाग़ में ...


चित्रपट / Film: Chand Aur Suraj
संगीतकार / Music Director: Salil Choudhary
गीतकार / Lyricist: शैलेन्द्र-(Shailendra)
गायक / Singer(s): आशा भोसले-(Asha)

Wednesday, August 15, 2018

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा

तू हिन्दु बनेगा ना मुसलमान बनेगा
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा ।

अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
तुझको किसी मजहब से कोई काम नहीं है
जिस इल्म ने इंसान को तकसीम किया है
उस इल्म का तुझ पर कोई इलज़ाम नहीं है
तू बदले हुए वक्त की पहचान बनेगा ।

मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने कहीं भारत कहीं इरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंध वो तूफ़ान बनेगा ।

नफरत जो सिखाये वो धरम तेरा नहीं है
इन्सां को जो रौंदे वो कदम तेरा नहीं है
कुरआन न हो जिसमे वो मंदिर नहीं तेरा
गीता न हो जिसमे वो हरम तेरा नहीं है
तू अम्न का और सुलह का अरमान बनेगा ।

ये दीन के ताजिर ये वतन बेचने वाले
इंसानों की लाशों के कफ़न बेचने वाले
ये महलों में बैठे हुए ये कातिल ये लुटेरे
काँटों के एवज़ रूह-ए-चमन बेचने वाले
तू इनके लिये मौत का ऐलान बनेगा।

Wednesday, August 1, 2018

चाहे ये मानो चाहे वो मानो

काबे में रहो या काशी में, निस्बत तो उसी की ज़ात से है
तुम राम कहो के रहीम कहो, मतलब तो उसी की बात से ह।

ये मस्जिद है वो बुतखाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो
मकसद तो है दिल को समझाना, मानो ये मानो चाहे वो मान।

ये शेख़-ओ-बरहमन के झगड़े, सब नासमझी की बाते हैं
हमने तो है बस इतना जाना, चाहे ये मानो चाहे वो मान।

गर जज़्ब-ए-मुहब्बत सादिक हो, हर दर से मुरादें मिलती हैं
मंदिर से मुरादें मिलती हैं, मस्जिद से मुरादें मिलती है।

काबे से मुरादें मिलती हैं, काशी से मुरादें मिलती हैं
हर घर है उसी का काशाना, चाहे ये मानो चाहे वो मानो।

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...