Thursday, May 25, 2017

क़ज़ा ज़ालिम सही

क़ज़ा ज़ालिम सही, ये ज़ुल्म वो भी कर नहीं सकती
जहां में कैस ज़िंदा है, तो लैला मर नहीं सकती
ये दावा आज दुनिया-भर से मनवाने की खातिर आ
ये दीवाने की ज़िद है, अपने दीवाने की खातिर आ

तेरे दर से मैं खाली लौट जाऊं, क्या कयामत है
तू मेरी रूह का काबा, मेरी जाने-इबादत है
जबीने-शौक के सजदों को अपनाने की खातिर आ

मेरी दीवानगी की, मेरी वहशत की कसम तुझको
गुरूर-ए-इश्क़ की, नाज़े-मुहब्बत की कसम तुझको
जमाने को वफ़ा की शान दिखलाने की खातिर आ

मैं तेरे हुस्न का सदका उतारूं, सामने आजा
गिरेबां धज्जियां कर-करके वारूं सामने आजा
शिकस्ता-पर, परेशां-हाल परवाने की खातिर आ

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...