Saturday, October 29, 2016

अजीब दास्ताँ है ये

अजीब दास्ताँ है ये
कहाँ शुरू कहाँ ख़तम
ये मंजिलें है कौन सी
न वो समझ सके न हम

ये रौशनी के साथ क्यूँ
धुंआ उठा चिराग से
ये ख्वाब देखती हूँ मैं
के जग पड़ी हूँ ख्वाब से
अजीब..

मुबारके तुम्हें के तुम
किसी के नूर हो गए
किसी के इतने पास हो
के सबसे दूर हो गए
अजीब..

किसी का प्यार ले के तुम
नया जहां बसाओगे
ये शाम जब भी आएगी
तुम हमको याद आओगे
अजीब..

Movie/Album : दिल अपना और प्रीत पराई (1960)
Music By : शंकर-जयकिशन
Lyrics By : शैलेन्द्र
Performed By : लता मंगेशकर


Friday, October 7, 2016

कश्ती का खामोश सफ़र है

कश्ती का खामोश सफ़र है, शाम भी है तनहाई भी
दूर किनारे पर बजती है लहरों की शहनाई भी
आज मुझे कुछ कहना है

लेकिन ये शर्मीली निगाहें मुझको इजाज़त दें तो कहूँ
खुद मेरी बेताब उमंगें थोड़ी फ़ुर्सत दें तो कहूँ
आज मुझे कुछ कहना है

जो कुछ तुमको कहना है, वो मेरे ही दिल की बात न हो
जो है मेरे ख़्वाबों की मंज़िल, उस मंज़िल की बात न हो

कहते हुए डर सा लगता है, कह कर बात न खो बैठूँ
ये जो ज़रा सा साथ मिला है, ये भी साथ न खो बैठूँ

कब से तुम्हारे रस्ते में मैं फूल बिछाये बैठी हूँ
कह भी चुको जो कहना है मैं आस लगाये बैठी हूँ

दिल ने दिल की बात समझ ली, अब मुँह से क्या कहना है
आज नहीं तो कल कह लेंगे, अब तो साथ ही रहना है

कह भी चुको जो कहना है
छोड़ो अब क्या कहना है

Friday, September 16, 2016

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

सुबह औ' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नज़र!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

हमारे कारवां का मंज़िलों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है तो स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू ज़िन्दा है


ना धेला लगता है, ना पैसा लगता है

ना धेला लगता है, ना पैसा लगता है
चढ़ के देखो जी, ये झूला कैसा लगता है

बिना कलों के जुड़ने वाला,बिना परों के उड़ने वाला
सारों झूलों से आला ये झूला, जो भी झूला वो सब दुख भूला
ना जैसा कुछ भी हो, ये वैसा लगता है
चढ़ के देखो जी, ये झूला कैसा लगता है

जो कोई छूना चाहे तारों को, मस्का लगाए जरा यारों को
बातें बनाए थोड़ा मुस्का के, झूले की डोरी थामे शरमा के
जैसे दो बाहें हो, ये वैसा लगता है
चढ़ के देखो जी, ये झूला कैसा लगता है

बांके हसीनों पे ये मरता है, प्यारों से प्यार सदा करता है
ऐसे न पीछे हटो डर-डर के, आओ झुला दें तुम्हें जी भर के
जो तुम पर आशिक हो, ये वैसा लगता है
चढ़ के देखो जी, ये झूला कैसा लगता है

Sunday, September 4, 2016

झूमती चली हवा

झूमती चली हवा, याद आ गया कोई
बुझती बुझती आग को, फिर जला गया कोई
झूमती चली हवा ...

खो गई हैं मंज़िलें, मिट गये हैं रास्ते
गर्दिशें ही गर्दिशें, अब हैं मेरे वास्ते
अब हैं मेरे वास्ते
और ऐसे में मुझे, फिर बुला गया कोई
झूमती चली हवा ...

चुप हैं चाँद चाँदनी, चुप ये आसमान है
मीठी मीठी नींद में, सो रहा जहान है
सो रहा जहान है
आज आधी रात को, क्यों जगा गया कोई
झूमती चली हवा ...

एक हूक सी उठी, मैं सिहर के रह गया
दिल को अपना थाम के आह भर के रह गया
चाँदनी की ओट से मुस्कुरा गया कोई
झूमती चली हवा ...


चित्रपट / Film: Sangeet Samrat Tansen
संगीतकार / Music Director: S N Tripathi
गीतकार / Lyricist: शैलेन्द्र-(Shailendra)
गायक / Singer(s): मुकेश-(Mukesh)

Thursday, August 25, 2016

इस रेशमी पाज़ेब की झंकार के सदके

इस रेशमी पाज़ेब की झंकार के सदके
जिसने ये पहनाई है उस दिलदार के सदके
उस ज़ुल्फ़ के क़ुरबां लब-ओ-रुखसार के सदके
हर जलवा था इक शोला हुस्न-ए-यार के सदके

जवानी माँगती ये हसीं झंकार बरसों से
तमन्ना बुन रही थी धड़कनों के हार बरसों से
छुप-छुप के आने वाले तेरे प्यार के सदके

जवानी सो रही थी हुस्न की रंगीं पनाहों में
चुरा लाये हम उनके नाज़नीं जलवे निगाहों में
किस्मत से जो हुआ है उस दीदार के सदके

नज़र लहरा रही है, जिस्म पे मस्ती सी छाई है
दुबारा देखने की शौक़ ने हलचल मचाई है
दिल को जो लग गया है उस आज़ार के सदके

Wednesday, August 17, 2016

आज रोना पड़ा

आज रोना पड़ा तो समझे
हँसने का मोल क्या है
अपना सपना खोना पड़ा तो समझे

ख़्वाबों की हक़ीक़त क्या थी
अरमानों की क़ीमत क्या थी
अपनों की मुहब्बत क्या थी
ग़ैर होना पड़ा तो समझे

सुख मिलता है किस मुश्किल से
क्या करती है दुनिया दिल से
इस रंग भरी महफ़िल से
दूर होना पड़ा तो समझे

निकले थे जिन्हें अपनाने
वो लोग थे सब बेगाने
इस बात को हम दीवाने
चैन खोना पड़ा तो समझे

इक परदेशी दूर से आया

इक परदेशी दूर से आया लड़की पर हक अपना जताया घर वालों ने हामी भर दी परदेशी की मर्ज़ी कर दी | प्यार के वादे हुए ना पूरे रह गए सारे ख्वाब अधू...